तीन बार जीतने के बाद BJP ने बिना लड़े गंवा दी थी यूपी की ये सीट, फिर बसपा ने… आखिरी वक्त पर हुई थी बस एक चूक
सुलतानपुर। जीत की हैट्रिक बना चुकी भाजपा ने चौथे मौके पर बिना लड़े ही 1999 में सुलतानपुर लोकसभा सीट गंवा दी थी। कारण, नामांकन के आखिरी वक्त तक भाजपा प्रत्याशी निर्वाचन अधिकारी के पास तक पहुंच ही नहीं सके थे। तय समय के बाद पेश उनके नामांकन पर्चे को निर्वाचन अधिकारी ने खारिज कर दिया था। ऐसा तब हुआ जबकि उस समय प्रदेश में कल्याण सिंह की अगुवाई वाली भाजपा की सरकार थी।

1991 में पहली बार भाजपा ने रामलहर में सुलतानपुर संसदीय सीट पर जीत दर्ज की थी। तब पार्टी ने राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े अयोध्या के संत विश्वनाथ दास शास्त्री को प्रत्याशी बनाया था। हालांकि, 1996 में पार्टी ने उनको मौका नहीं दिया। उनके स्थान पर विवादित ढांचा ध्वंस के समय फैजाबाद (अब अयोध्या) के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे देवेंद्र बहादुर राय को प्रत्याशी बनाया था
राय ने 1996 और फिर 1998 में इस सीट पर पार्टी का कब्जा बरकरार रखा। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के एक वोट से गिरने के बाद 1999 में एक बार फिर लोकसभा चुनाव हुआ। इसमें पार्टी ने फिर अपना प्रत्याशी बदल दिया।

1999 के चुनाव में क्या हुआ था?
1999 के चुनाव में गोंडा निवासी पार्टी के वरिष्ठ नेता सत्यदेव सिंह यहां से उम्मीदवार थे। नामांकन के आखिरी दिन उन्होंने पर्चा दाखिल किया था। तत्कालीन जिलाधिकारी/निर्वाचन अधिकारी अनुराग श्रीवास्तव ने उसे विलंब के आधार पर खारिज कर दिया था। इस मुद्दे पर काफी विवाद हुआ था।
हालांकि, उस समय कल्याण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे, लेकिन पार्टी को उनसे कोई सहायता नहीं मिल सकी थी। उन दिनों पार्टी के शिखर नेताओं अटल -आडवाणी से कल्याण सिंह के गिले -शिकवों की काफी चर्चा थी। तीन बार से जीती जा रही सीट पर पार्टी प्रत्याशी के बिना लड़े ही मैदान से बाहर हो जाने के कारण भाजपा नेता -कार्यकर्ता काफी निराश हुए थे।

बसपा ने इस अवसर का उठाया पूरा लाभ
उधर, बसपा ने इस अवसर का पूरा लाभ उठाया। भाजपा की अनुपस्थिति ने उसका काम आसान किया। बसपा प्रत्याशी जयभद्र सिंह ने इस चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी सपा के राम लखन वर्मा को पराजित किया था। बसपा को 1,73,558 तथा सपा को 1,58,959 वोट प्राप्त हुए थे। सुलतानपुर लोकसभा सीट पर यह बसपा की पहली कामयाबी थी।
इसे पार्टी ने 2004 में भी दोहराया। हालांकि, तब उसने ताहिर खान को अवसर दिया था। दूसरी ओर 1999 में बिना लड़े मैदान से बाहर हुई भाजपा को 2004 और 2009 के चुनाव में भी पराजय का मुंह देखना पड़ा था। हालांकि, मोदी लहर में 2014 में वरुण गांधी और 2019 में मेनका गांधी को प्रत्याशी बनाकर पार्टी ने फिर से इस सीट पर कब्जा किया।



