चकियाः महुआ का आदिवासी संस्कृति में बड़ा है महत्व, मानव शरीर के लिए महुआ करता है एंटी वायरस का काम……

आदिवासी.वनवासी संस्कृति में वर्ष भर होता है इसका इस्तेमाल

-राम आशीष भारती

चकिया, चंदौली। खासतौर पर आदिवासियों के लिए महुआ वरदान माना जाता है। यह समुदाय अपनी भूख से लेकर इलाज तक की आवश्यकताओं को इसी से पूरा करते है। इसके तने की छाल, पत्तियों से लेकर फूल, फल और बीज तक इस्तेमाल वे सदियों से करते चले आ रहे हैं। ग्रामीण अंचलों के अलावा शहरी क्षेत्रों में भी काफी लोग इससे परिचित हैं। हिंदुओं में मनाए जाने वाले हलछठ में महुआ के फूल को दही के साथ पूजा में चढ़ाया जाता है।

बुजुर्गवार बताते है कि क्षेत्र के प्रमुख वनोपज महुआ का आदिवासी संस्कृति में बड़ा ही महत्व है। आदिवासियों के दैनिक जीवन में महुआ के फूल एवं बीज का उपयोग केवल खाद्य पदार्थ के रूप में ही नहीं अपितु वे इसका औषधि के रूप में भी इस्तेमाल करते है। इसके साथ यह उपज उनके आजीविका के प्रमुख साधनों में से एक है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महुआ के फूल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है। इसका नियमित सेवन स्वास्थ्य के लिए भी काफी लाभप्रद बताया गया है। महुआ का ताजा फूल मिश्रित सफेद पीला और सूखने पर मिश्रित लाल भूरा होता है। कच्चा फल हरा और पका फल मिश्रित लाल पीला रंग का होता है। इसके फूल मार्च से अप्रैल और फल मई से अगस्त तक मिलते हैं। पके फल जुलाई से आना शुरू हो जाते हैं। उसका मीठा स्वाद सबको लुभाता है। इससे निकलने वाली बीज को डोरी के नाम से जाना जाता है। इसे सुखाकर तेल निकाला जाता है। जिसका उपयोग खाद्य तेल, साबुन बनाने समेत विभिन्न औषधि के रूप में भी किया जाता है।

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